2 thoughts on “PARAG APRIL 1969

  1. HARDEV KRISHAN

    पराग का पुराना अंक( अप्रैल,69) देखकर अपना बचपन याद आ गया है। मैंने नंदन. चंपक, लोटपोट, चंदामामा और पराग को खूब पढ़ा है। लापरवाही के चलते पुराने अंक सहेज नहीं पाया। आज ये बहुत याद आते हैं। उस वक्त कभी सोचा नहीं था कि पराग आदि पत्रिकाएं बंद भी हो सकती हैं।
    पराग बड़े आकार में भी छप चुकी है। छोटूलंबू नाम की चित्रकथा बहुत पसंद की जाती थी। शुजा नामक चित्रकथा भी होती थी , इसका हीरो फैंटम जैसा बलशाली होता था। स्व. कन्हैया लाल नंदन के संपादन में यह पत्रिका खूब परवान चढ़ी। बात में धीरे-धीरे इसमें परिवर्तन के नाम पर ऐसा कबाड़ा हुआ कि इसे बंद कर देने की नौबत आ गई। आप को धन्यवाद जो पुराने अंक नेट पर उपलब्ध करवा रहे हैं।

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